परिवर्तन - The Change

by Nav 18. October 2008 10:58

सब लोग बदल गए हैं,
सब चेहरे अब नए हैं,
रहते थे जो संग हर पल,
वो साथी कहीं और चले गए हैं,
अब सब लोग बदल गए हैं,
सब चेहरे अब नए हैं!

स्मरण हैं वो पल जो संग बिताये थे,
स्मरण हैं वो उत्सव जो संग मनाये थे,
दुःख सुख के वो साथी अब कुछ दूर चले गए हैं,
सब लोग बदल गए हैं,
सब चेहरे अब नए हैं!

वही जगह है जहाँ सब रोज आते थे,
वही जगह है जहाँ छोटी बड़ी खुशियाँ मानते थे,
अब उसी जगह के मौसम बदल गए हैं,
सब लोग बदल गए हैं,
सब चेहरे अब नए हैं!

सब थे परिचित हम से जहाँ,
आज मिलते सब अपरिचित हैं वहां,
कुछ हैं जो अब भी पहचानते हैं,
बाकी सब लोग बदल गए हैं,
सब चेहरे अब नए हैं!

जीवन पथ पर अग्रसर कुछ आगे निकल गए हैं,
कुछ साथी ऐसे हैं जो पीछे छुट गए हैं,
पर हर पग पर साथी कुछ नए भी मिल रहे हैं,
पुराने सब लोग बदल गए हैं,
सब चेहरे अब नए हैं!

परिवर्तन में ही शायद यह सृष्टि समाहित है,
कोई नही है जो परिवर्तन से अप्रभावित है,
इसी के कारण जीवन चक्र चल रहे है,
चाहे सब लोग बदल गए है,
चाहे सब चेहरे नए हैं!!!

The origin point of this poem is my previous office. When I visited it yesterday, I could hardly see anyone known to me, only 3-4 persons were there. Rest all were new.

Nav

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Poem | Hindi

Someone calling....

by Nav 11. October 2008 12:45

आज मन में अजब सी खुशी सी है,
होंठों पर एक अनजानी हसीं सी है,
तनहा बैठा हूँ अपनी ही सोच में मगर,
फ़िर भी हो रही महसूस एक आहट सी है...

जैसे कोई अपनी और बुला रहा है,
जैसे कोई इस तन्हाई को मिटा रहा है,
बेशक नही है सामने नज़रों के,
पर हो रही महसूस किसी की मोजुदगी सी है...

कहाँ से आया ये, कौन है, कहाँ है,
कयूं मेरी नज़रों के दायरे से बाहर है,
कयूं छुपा है कहीं नजदीक मेरे,
आए सामने, यह सब जानने की जिज्ञासा सी है...

बताओ मुझे अगर कोई जानता है,
दिखाओ मुझे अगर कोई पहचानता है,
कोई सपना है या है हकीक़त,
अब तो मिलने की एक तमन्ना सी है...

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Poem | Hindi

Today's Morning...

by Nav 20. September 2008 12:33

आज की सुबह के बारे में कुछ लिखने को दिल चाहता है
पर क्या लिखू मेरा मन समझ नही पाता है
वह पर्वत के पीछे से उदय हो रहा सूर्य, जैसे मुझे अपनी और बुलाता है
कैसे इस सुंदर सुबह को कागज पर उतारू, मेरा मन यही सोचता जाता है
आज की सुबह के बारे में कुछ लिखने को दिल चाहता है...

वो घास पर परी ओस की बुँदे, जिन्हें सूर्य हीरों सा चमकाता है
वह हीरों जड़ा घास मुझे आकर्षित करता जाता है
आज की इस सुबह को कैसे वर्णित करूँ, मेरा मन समझ नही पाता है
आज की सुबह के बारे में कुछ कहने को दिल चाहता है...

वह पेड़-पोधो के पत्तो से टकराती पवन, जिस से हर पत्ता हिलता जाता है
वह फूलों के मुख से आती सुगंध, जिस से मन हर्षित होता जाता है
इतनी अच्छी सुबह के उपहार के लिए, इश्वर का धन्यवाद करने को दिल चाहता है
आज की सुबह के बारे में कुछ कहने को दिल चाहता है...

वह पक्षियों का चेह्चहाना, जिसे बार बार सुनने को दिल चाहता है
वो झरने के गिरने की कल-कल, जिस के किनारे बठे रहने को दिल चाहता है
इस सुबह में है अजब आकर्षण, जिस से दूर होने को दिल नही चाहता है
ऐसी प्यारी सुबह के बारे में, कुछ तो लिखने को दिल चाहता है...

प्रकृति की इस अदभुत संरचना को, कागज़ सँभाल नही पाता है
मैं कुछ लिखना भी चहुँ, तो कोई शब्द स्मरण नही आता है
फ़िर भी चाहता हूँ की कुछ लिखूं, पर लिखते लिखते हाथ रुक सा जाता है
आज की सुबह के बारे में कुछ लिखने को दिल चाहता है....

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Poem | Hindi

I am back...

by Nav 28. August 2008 12:24

HI

I am back... after long time... with a new blog... Lets try to keep it alive unlike earlier one. This time starting it with a poem...

The Evening

किसी चित्रकार के चित्रपट सा लग रहा नील गगन,
कही उड़ रहे खग तो कही रंग बिरंगे पतंग,
पर्वतों पर छाई बादलों की काली घटा,
इस के विपरीत दूजी ओर है सूरज की लाल छटा,
श्याम के इस अद्भुत आकाश को निहारता मैं,
भगवान् के बनाये इस चित्र को सराहता मैं,
सोचता हूँ कागज़ पर इसे उतार लाऊं,
पर भगवान् जैसी कलात्मकता कहाँ से लाऊँ,
रंग तो मिल जायंगे चित्रकारी के लिए बहुत,
पर रंगों का इतना सुंदर उपयोग इन हाथों को कैसे सिखाऊं,
इन हाथों में लाऊँ इतना ज़ोर कैसे,
असमान सा रंग कागज़ पर लगाऊं कैसे,
जैसा रंग दिया इसको भगवान् ने,
रंगों का इतना प्यारा मिलन बनाऊँ कैसे.

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Myself Navdeep Bhardwaj, I have done MCA and currently working as a software engineer at Chandigarh.

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