HI
I am back... after long time... with a new blog... Lets try to keep it alive unlike earlier one. This time starting it with a poem...

किसी चित्रकार के चित्रपट सा लग रहा नील गगन,
कही उड़ रहे खग तो कही रंग बिरंगे पतंग,
पर्वतों पर छाई बादलों की काली घटा,
इस के विपरीत दूजी ओर है सूरज की लाल छटा,
श्याम के इस अद्भुत आकाश को निहारता मैं,
भगवान् के बनाये इस चित्र को सराहता मैं,
सोचता हूँ कागज़ पर इसे उतार लाऊं,
पर भगवान् जैसी कलात्मकता कहाँ से लाऊँ,
रंग तो मिल जायंगे चित्रकारी के लिए बहुत,
पर रंगों का इतना सुंदर उपयोग इन हाथों को कैसे सिखाऊं,
इन हाथों में लाऊँ इतना ज़ोर कैसे,
असमान सा रंग कागज़ पर लगाऊं कैसे,
जैसा रंग दिया इसको भगवान् ने,
रंगों का इतना प्यारा मिलन बनाऊँ कैसे.
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